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Bhagwan Jagannath Puri – जगन्नाथ मंदिर के 14 चमत्कार

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Jagannath Puri

Jagannath Puri Mandir

नमस्कार दोस्तों, मेरी वेबसाइट हिंदी मे सारी जानकारी में आप का स्वागत है.

मैं आपकी दोस्त नीरू। आज मैं आप लोगो के लिए एक कहानी लेकर आई हूँ जो की एक सत्य कहानी है।

भगवान जगननाथ जी के पुरी के मंदिर के रहस्यों के बारे में कई कहानिया प्रचलित है। मगर आज भी यह मंदिर कई रहस्यों से भरा हुआ है। इस मंदिर को लेकर बहुत सारे रहस्य है। मगर इन रहस्यों के बारे में आज तक कोई भी सही से नहीं जान पाया है।

Jagannath Puri Mandir कहानी

तो चलिए शुरू करते है भगवान जगननाथ जी के पुरी धाम के बारे में जो भी बाते और कहानियाँ प्रचलित है। जैसा की आप सभी जानते होंगे की भगवान विष्णु जी के चार धाम है- बद्रीनाथ धाम ,द्वारिका धाम ,जगननाथ पुरी धाम और रामेश्वरम।

जिनके लिए यह मान्यता प्रचलित है की भगवान विष्णु जी अपने इन चारो धामों पर बसे।

  • जब वो अपने इन धामों की यात्रा करते है तो सबसे पहले हिमालय की ऊंची चोटियों पर बने अपने धाम बद्रीनाथ धाम पर जाते है और वहाँ पर स्नान करते है।
  • इसके बाद वो पश्चिम में बने अपने द्वारिका धाम जाते है और वहाँ पर वस्त्र बदलते है।
  • इसके बाद वो पुरी में भोजन करते है जिसकी आज मैं कहानी आपको बताने जा रही हूँ।
  • फिर आखिरी में दक्षिण में स्थित रामेश्वरम धाम में वो विश्राम करते है।

इन सभी में से पुरी का जो धाम है वो इनमे से एक है।

पुरी धाम में भगवान अपने बड़े भाई बलराम जी और अपनी छोटी बहन सुभद्रा जी के साथ विराजमान है। यहाँ पर इन तीनो की काठ की मुर्तिया है। पुरी का अपना एक प्राचीन इतिहास है जो प्राचीन हिन्दुओ की सात पवित्र नगरिया मानी जाती है, उनमे से एक पुरी नगरी भी काफी प्रचलित है।

यह उड़ीसा में स्थित है। यह पुरी धाम उड़ीसा की राजधानी भुबनेश्वर के नजदीक ही है, ज्यादा दूर नहीं है। समुन्दर के किनारे यह स्थित, बहुत ही खूबसूरत और अद्भुत है।

पुराने ज़माने मैं उड़ीसा का नाम उत्कलप्रदेश हुआ करता था। उस समय में यह प्रदेश काफी प्रचलित था, क्योंकि यह समुन्द्र के किनारे पर स्थित है। व्यापारिक दृस्टि से भी बहुत ही महत्वपूर्ण होता था। समुद्र के किनारे बंदरगाह से और काफी देशो के साथ व्यापर यहाँ से होता था।

यह काफी और भी नामो से भी पुकारा गया, जैसे की कभी इसे शीर्ष क्षेत्र कहा गया, कभी इसे पुरुषोत्तम क्षेत्र कहा गया, तो कभी नीलांचल और कभी नीलगिरि कहा गया. अब हम इसे जगननाथ पुरी कहते है।

जगननाथ पुरी की हर साल काफी बड़ी रथ यात्रा भी निकाली जाती है। इसमें लाखो भक्त शामिल होते है जो की अलग- अलग जगहों से आते हैं। भगवान के रथ को खींचने के लिए लोगो में काफी उत्साह होता है। एक बार एक मुस्लिम आदमी ने तो सुप्रीमकोर्ट में याचिका भी दायर किया था की मुझे भी आज्ञा दी जाये रथ को खींचने की। मेरी भी बहुत इच्छा है, प्रभु के रथ को खींचने की । क्यूंकि यह मान्यता है की जो भी प्रभु के रथ को खींचता है या यह कह सकते हैं की जिस किसी को भी यह सौभाग्य प्राप्त होता है, उसके सभी पापो का अंत हो जाता है।

इस मंदिर की एक खास बात यह है की यहाँ जो मूर्तियां है, वो काठ की है, जो की अपने ही आप में काफी विचित्र है। यह एक नीम के पेड़ की लकड़ी से बनी हुई मूर्तियां है। विचित्र इसलिए कहा जाता है, क्यूंकि ज्यादातर पत्थर या धातु की मूर्तियां ही मंदिरो मे स्थापित है। सिर्फ यहाँ जगननाथ धाम में ही काठ की मूर्तियां स्थापित है।

जगननाथ धाम को लेकर काफी कहानिया प्रचलित है और काफी रहस्य भी माने जाते है। उनमे से एक सबसे बड़ा रहस्य या कहें की कहानी प्रचलित है,

जब भगवान कृष्ण की मृत्यु हुई थी, जब उनका अंतिम संस्कार किया गया उस वक़्त उनका पूरा देह तो पंचतत्व में विलीन हो गया मगर उनका ह्रदय जीवित था और सामान्य तरीके से धड़क भी रहा था और पूरी तरह से सुरक्षित था।

कहते है की आज भी भगवान का ह्रदय जीवित है और भगवान जगननाथजी की मूर्ति के अंदर पूर्णतया सुरक्षित है। भगवान् जगननाथ से जुडी हुई यह एक आस्था है और मान्यता भी है।

तो अब बात यह है की यदि ऐसा है कि भगवान का दिल यहाँ पर स्थित है तो ज्यादातर लोगो को इसके बारे में जानकारी क्यों नहीं है। इस बात को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता है। हमेशा छुपाया गया है।

Jagannath Puri का रहस्य

. श्री कृष्ण को कलयुग के भगवान भी कहा जाता है। और यह भी माना जाता है की कल्कि अवतार में भी भगवान फिर से अवतार लेंगे। इस मंदिर के बारे में सबसे रोचक बात यह है की, हर 12 साल में भगवान कृष्ण, बलराम और माता सुभद्रा जी की मूर्तियों को बदल दिया जाता है।

. उसके लिए भी यह कहानी प्रचलित है की मंदिर के पुजारी को स्वपन में आकर भगवान् खुद बताते है की किस पेड़ से मुर्तिया बनाई जाएँगी। यानि की उस पेड़ का चुनाव भी स्वयं भगवान् ही करते है और स्वप्न में आकर पुजारी को बता देते है की इस पेड़ से ही हमारी मूर्तियां बनाई जाएँगी। फिर वह पेड़ कही भी हो, चाहे किसी के घर में ही क्यों न हो.

अब उसपर पूर्ण अधिकार भगवान का ही माना जाता है और कोई भी किसी भी तरह का विरोध भी नहीं करता। आखिर करे भी क्यों, यह तो उसका सौभाग्य है की उनके घर के पेड़ को प्रभु ने चुना।

.अब बात आती है जब 12 साल बाद मूर्तियों को बदलने का काम किया जाता है, तब पुरे शहर की बिजली काट दी जाती है। पूरी तरह से ब्लैकआउट कर दिया जाता है और पुरी जगन्नाथ मंदिर की सुरक्षा CRPF (सेना )के हाथ में दे दी जाती है। यानि की काफी ज्यादा सुरक्षा का प्रबंध किया जाता है। इस वक़्त कोई भी मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता है और जिस समय मूर्तियों को बदलने की प्रक्रिया होती है उस वक़्त मंदिर में पूरा अँधेरा होता है।

जिस पुजारी को यह मूर्ति बदलने का काम करना होता है, उसकी आँखों पर भी पट्टी बाँधी जाती है। हाथो में मोटे कपडे के दस्ताने (GLOVES ) पहनाये जाते है। यानि की वो भी कुछ नहीं देख सकता। इसी अँधेरे में ही उसको मूर्तियों को बदलना पड़ता है।

खासकर जब वो पुजारी भगवान जगननाथ जी की मूर्ति को बदलते है तो उस वक़्त वह पुरानी मूर्ति से भगवान के दिल या फिर कहे तो ब्रह्म पदार्थ को नयी मूर्ति में स्थापित करते है। जी हां, यहाँ पुरीधाम में भगवान के दिल को ब्रह्मपदार्थ ही बोलते है। मगर आज तक इस ब्रह्म पदार्थ को किसी ने भी नहीं देखा।

यहाँ तक की जो पुजारी इन मूर्तियों को बदलता है, उसे भी नहीं पता होता है की यह कैसा दिखता है। यह इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य है जो की हजारो या कह सकते है, की सैकड़ो सालो से यह रहस्य बना हुआ है।

. इस ब्रह्म पदार्थ के बारे में यह भी मान्यता है की यदि किसी ने इसे देखा तो तुरंत ही उसकी मृत्यु हो जाएगी या कह सकते है की वो देख भी नहीं पायेगा। क्योकि उसको देखते ही सामने वाले के शरीर के चीथड़े उड़ जायेंगे। मतलब की वह व्यक्ति कई टुकड़ो में फुट जायेगा।

हमेशा भगवान कृष्ण से ही इस ब्रह्म पदार्थ को जोड़ा जाता है। लेकिन यह कैसा होता है, कैसा दीखता है, यह कोई भी नहीं पता है। यह परंपरा आज भी वैसे ही निभाई जा रही है। ठीक 12 साल में मूर्तियों को बदला जाता है और ब्रह्म पदार्थ को पुरानी मूर्तियों से निकाल कर नई मूर्तियों में रख दिया जाता है। काफी वर्षो से यही चला आ रहा है।

कुछ पुराने पुजारियों से जब पूछा गया की वह पदार्थ कैसा होता है तो वह बताते है की वो एक उछलती हुई सी कोई वस्तु है जो की लगता है जैसे की कोई खरगोश सा कुछ उनके हाथो में उछल रहा हो। ज्यादा तो कोई नहीं बता पता क्योकि उनकी आँखों पर पट्टी होती है और हाथो में भी दस्ताने होते है।

. यह एक बहुत ही गोपनीय तरीके से किया जाता है। और एक बात जो पुरानी मुर्तिया होती है, उन्हें जंगल में किसी स्थान पर रख दिया जाता है, जहाँ से वो मुर्तिया गायब हो जाती है, यही मान्यता है।

. जैसा की मैंने आपको पहले बताया था की हर साल भगवान् की रथ यात्रा निकाली जाती है। जिसका टीवी पर भी लाइव टेलीकास्ट होता है। उस समय पुरी के राजा भी आते है और रथ के आगे सोने की झाड़ू लगाते हुए चलते है, रथ के आगे। यदि आप देखेंगे तो यह दृश्य आप टीवी पर भी देख पाएंगे।

. इसके आलावा इस मंदिर के और भी काफी रहस्य है। उनमे से एक यह भी है, क्योकि यह मंदिर समुन्द्र के किनारे पर स्थित है तो इस मंदिर में एक सिंह द्वार है। तो इस सिंह द्वार के अंदर जैसे ही आप एक कदम रखते है, वैसे ही लहरों की आवाज बिलकुल ही बंद हो जाती है। एकदम शांत हो जाती है। यदि आप फिर से एक कदम बाहर रखते है, फिर से लहरों की आवाजे आना शुरू हो जाती है।

. एक और भी बहुत ही विचित्र रहस्य है की इस मंदिर से कुछ दूरी पर चिताये (deadbodies ) भी जलाई जाती है। जब आप मंदिर के बाहर होते है तो आपको चिताओ के जलने की गंध भी काफी आती है। मगर जैसे ही आपने एक कदम द्वार के अंदर रखा, वो गंध गायब हो जाती है और बाहर आते ही फिर से गंध शुरू हो जाती है। यह भी एक रहस्य है जिसके बारे मैं किसी को भी नहीं मालूम है की ऐसा क्यों है।

. एक और अजीब चीज है की, वैसे हम सभी देखते है की जहाँ कही भी कोई मंदिर या कोई भी धार्मिक स्थान होता है। किसी भी तरह का पक्षी, परिंदे बैठते है जो की बहुत ही आम बात है। मगर यहाँ जगननाथ धाम में गुम्बद पर कभी भी कोई पक्षी नहीं बैठता है और न ही ऊपर से उड़कर जाता है। यह भी बहुत ही विचित्र बात और रहस्य है।

तो जब यह देखा गया की मंदिर के ऊपर से कोई भी पक्षी भी नहीं उड़ता, तो हवाई जहाज या किसी भी तरह के हेलीकॉटर को ऊपर से उड़कर जाने की अनुमति नहीं है।

१०. एक और अजीब बात यह है की, इस मंदिर का जो शिखर है, उसकी कभी भी कोई परछाई जमीं पर नहीं पड़ती है। यानि की मंदिर की परछाई कभी भी जमीं पर नहीं देखी जाती है। यह भी एक बहुत ही बड़ा रहस्य है।

हर चीज की परछाई होती है और दिखाई भी देती है। हालाकिं यह एक बहुत ही बड़ा मंदिर है लगभग 400000 वर्गफुट जगह में यह मंदिर बना हुआ है और इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है। लेकिन किसी भी वक़्त आपको इस मंदिर की या गुम्बद की परछाई दिखाई नहीं देगी। यह अपनेआप में ही एक अजूबा है।

११. इस मंदिर के बारे में एक और भी बात प्रचलित है। वो यह है की इस मंदिर के शिखर पर एक झंडा हमेशा लहराता रहता है। इस झंडे को रोज शाम को बदलने का नियम है और मान्यता है की यदि इस झंडे को नहीं बदला गया तो यह मंदिर अगले 18 वर्षो के लिए बंद हो जायेगा। इसीलिए इस झंडे को बदलना बहुत जरुरी है और हर रोज इसे बदला जाता है। यह झंडा हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। यानि की जिस तरफ की हवा होती है, उसके विपरीत यह झंडा लहराता है।

१२. भगवान् जगननाथ के मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र भी लगा हुआ है। जिसे की हम जब देखते है तो उसका मुँह हमे हमारी तरफ ही दिखाई देता है। चाहे जहाँ से भी देखे, वह एक जैसा ही हमे हमारी तरफ ही दीखता है। ऐसा पुरी धाम शहर के सभी मंदिरो में होता है। मगर यदि हम दूसरे शहरो के मंदिरो को देखे तो ऐसा नहीं होता। सिर्फ पुरी शहर में ही ऐसा प्रतीत होता है जो की एक रहस्य ही है।

१३. इस मंदिर को लेकर एक और सबसे ज्यादा प्रचलित रहस्य है वो है इस मंदिर की रसोई के बारे मे। क्योकि इस मंदिर की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी रसोइयों में से एक है। जिसमे 500 से अधिक रसोइये काम करते है और 300 उनके असिस्टेंट यानि की मदद करने वाले। इस रसोई की काबिलियत इतनी अधिक है की आप लाखो लोगो को खाना बना कर खिला सकते है। तो आप सोच सकते है की कितनी बड़ी रसोई है यहा पर।

इस मंदिर की रसोई से जुड़ा यह रहस्य है की चाहे कितने भी भक्त आ जाये यहाँ कभी भी प्रसाद कम नहीं पड़ता।चाहे लाखो में भक्त क्यों न आ जाये। लेकिन जैसे ही मंदिर का द्वार बंद करने का वक़्त होता है प्रसाद अपने आप ख़त्म हो जाता है। मतलब यहाँ प्रसाद कभी भी व्यर्थ नहीं होता ना ही बचता है। यह अपनेआप में ही किसी चमत्कार से कम नहीं है।

१४. इसी प्रसाद और मंदिर से जुडी एक और बात बहुत प्रचलित है की यहाँ जो प्रसाद बनता है, वो लकड़ी के चुल्हे पर बनता है और मिटटी के बर्तनो में ही बनाया जाता है। और सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात है की सात बर्तनो में बनता है। इन सातो बर्तनो को एक के ऊपर एक करके रखा जाता हैऔर सबसे पहले सबसे ऊपर वाला बर्तन का खाना तैयार होता है जो की आग से सबसे अधिक दूर होता है।

उसके बाद दूसरा ऊपर से, फिर तिसरा ऊपर से, फिर इसी क्रम में प्रसाद तैयार होता है। सबसे आखिर में पहला बर्तन जो रखा था, वो प्रसाद तैयार होता है। आप खुद सोचेंगे की यह कैसे मुमकिन है पर यह चमत्कार रोजाना भगवान् जगन्नाथ की रसोई में होता है। यह मान्यता है की भगवान के प्रसाद की देखभाल खुद माता लक्ष्मी जी(goddess laxmi) करती है। यह उनकी रसोई है। और वो तो खुद ही अन्नपूर्णा देवी है इसीलिए यहाँ कभी भी प्रसाद कम नहीं पड़ता और न ही व्यर्थ होता है।

भगवान् जगननाथजी का मदिर ऐसे ही सब रहस्यों से भरा हुआ है। और भी काफी सारे रहस्य और कहानिया प्रचलित है, जिन्हे एक साथ बता पाना मुश्किल है। इसीलिए आज मैं यह भाग-1 लेकर आई हूँ।

हम भाग-2 में, भगवान् जगननाथजी के प्रसाद के बारे में जो कहानी प्रचलित है, उसके बारे में बात करेंगे। भगवान् के प्रसाद का महत्त्व और पूरे संसार में वह कितना प्रचलित है।

आशा करती हूँ, की आप सभी को यह जानकारी और रहस्य अच्छा लगेगा। यदि आप भी किसी रहस्य के बारे में जानते है तो हमारे साथ जरूर शेयर करे और यदि आप कोई और भी कहानी या रहस्य के बारे में जानकारी चाहते है, तो हमे कमैंट्स के जरिये बताइये। हम कोशिस करेंगे की वो कहानी आपके लिए जल्द से जल्द लेकर आये।

जल्द ही भाग-२ के साथ मिलेंगे, तब तक के लिए नमस्कार।

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धन्यवाद और आप का दिन शुभ हो।

आपकी दोस्त,

Neeru

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Bhagwan Jagannath Ji के महाप्रसाद की कथा और महिमा | भगवान के 56 प्रकार के भोजन का क्या रहस्य है ?

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Bhagwan Jagannath Ji के महाप्रसाद की कथा

नमस्कार दोस्तों, मेरी वेबसाइट हिंदी मे सारी जानकारी में आप का स्वागत है.

मैं आपकी दोस्त नीरू, आज भगवान जगन्नाथजी के महाप्रसाद की कथा लेकर आई हूँ।

आज हम जानेंगे की भगवान् का महाप्रसाद कितना दुर्लभ है और इस महाप्रसाद की महिमा क्या है। साथ ही आज मैं आपको बताउंगी की भगवान् को 56 प्रकार के व्यंजनों का प्रसाद क्यों लगता है?

एक बार की बात है जब नारद जी रोजाना भगवान विष्णु जी के दर्शनों के लिए वैकुण्ठ धाम जाते थे। और भगवान् के दर्शन करके वापिस आ जाते। यही क्रम रोजाना चलता था। एक दिन नारद जी के मन में यह विचार आया कि काश मुझे भगवान का महाप्रसाद मिल जाये तो कितना अच्छा होगा।

यही विचार करके वो माता लक्ष्मी जी के पास गए और आग्रह कर कहा माता क्या मुझे आप भगवान् का प्रसाद दिलवा दोगी तो आपकी बड़ी कृपा होगी। मगर माता लक्ष्मी कहती है की भगवान् का प्रसाद मिलना इतना भी आसान नहीं है। उसके लिए भगवान् की आज्ञा अत्यंत आवश्यक है। बिना भगवान् की आज्ञा के मैं किसी को भी भगवान् का प्रसाद नहीं दे सकती।

फिर नारद जी ने भगवान् को प्रसन्न करने के लिए १२ वर्षो तक कठिन तपस्या की, मगर भगवान् की प्रसन्ता पाना इतना आसान काम नहीं था। इतनी तपस्या करने के बाद भी नारद जी को प्रसाद नहीं मिला। अब नारद जी विचार करने लगे की अब मैं ऐसा क्या करू की मुझे भगवान् का प्रसाद मिल जाये।

फिर नारद जी ने एक योजना बनाई की यदि मैं यहाँ पर प्रभु के घर में सेवा करूँगा तो शायद मुझे प्रसाद की प्राप्ति हो जाएगी। ऐसा विचार करके नारद जी ने एक स्त्री का स्वरुप धारण किया। साडी पहनकर और श्रंगार करके रोजाना रात को २ बजे – ३ बजे आकर भगवान् के दरबार को झाड़ू लगाते थे और पूरी सफाइयाँ रात के अँधेरे में ही करके चले जाते थे।

ऐसा कई दिनों तक चलता रहा। यह सब देखकर लक्ष्मी जी हैरान हो जाती थी, की इतना सुबह- सुबह कौन पूरा दरबार साफ करके जाता है, यह तो जानना ही पड़ेगा।

एक दिन लक्ष्मी जी निश्चय करती है की जो कोई भी यहाँ आकर रोज सफाई करता है, मैं उसको छुप कर देखूंगी और फिर पकड़ लुंगी। इसीलिए वो रात को ही पेड़ के पीछे छुपकर खड़ी हो गयी। फिर ठीक रोजाना के समय पर नारद जी स्त्री के स्वरुप में साडी पहनकर आये और भगवान् के दरबार की सफाई करने लगे।

नारदजी पूरी लगन के साथ सफाई करने में लगे हुए थे तभी लक्ष्मी जी ने पीछे से आकर नारद जी को पकड़ लिया और पूछने लगी की कौन हो तुम और रोज आकर चुपचाप सफाई क्यों करती हो। क्या इरादा है तुम्हारा। इस तरह से माता लक्ष्मी जी ने एक साथ बहुत सारे सवाल पूछ डाले।

फिर नारद जी अपने असली स्वरुप में आ कर माता लक्षमी से बोले की माँ मैं नारद हूँ। भगवान के प्रसाद को पाने की भावना से भगवान की सेवा कर रहा हूँ। ताकि भगवान प्रसन्न होकर प्रसाद देने की कृपा करे। फिर लक्ष्मी जी बोली की आपने इतने साल तक तपस्या किया फिर भी आपको प्रसाद नहीं मिला और अब आप प्रसाद पाने के लिए झाड़ू लगा रहे हो।

माता बहुत आश्चर्य चकित हो गयी। मगर नारद जी पर तो धुन सवार थी की प्रभु का प्रसाद खाना है। वो फिर माँ से आग्रह करने लगे की माँ आप बोलिये प्रभु को की मुझ पर वो अपनी कृपा करे और प्रसाद मुझे प्रदान करे।

फिर माता लक्ष्मी जी नारायण भगवान विष्णु के पास गयी और प्रभु से पूछा कि नारद जी आपके प्रसाद के लिए बहुत आग्रह कर रहे है। प्रभु कृपा करके आप उनकी विनती स्वीकार करो। फिर नारायण भगवान विष्णु मुस्कराये और बोले की आप जाकर नारद जी के लिए 56 प्रकार का जो मेरा भोजन है वह तैयार करो।

फिर माता लक्ष्मी जी भगवान् की आज्ञा पाकर भगवान् श्री विष्णु जी का प्रसाद तैयार करती है। 56 प्रकार के व्यंजन बनाती है और फिर उनका भगवान् श्री विष्णुजी को प्रसाद लगाती है। भगवान ने थोड़ा प्रसाद खाकर बाकि का प्रसाद नारद जी को देने के लिए कहा। तब माता लक्ष्मी जी ने प्रभु की आज्ञा से नारद जी को भगवान का प्रसाद दिया।

नारद जी बहुत ही अधिक प्रसन्न हुए और बहुत ही चाव से पूरा प्रसाद खा लिया। फिर तो नारद जी भगवान् का नाम जितना जपते वो उसका लाख गुना हो जाता क्योकि भगवान् का प्रसाद जो नारद जी ने खाया था। इसी प्रकार नारद जी नारायण – नारायण करते हुए वैकुण्ठ धाम से सीधा चले गए भगवान् शिव के धाम।

नारद जी को इतना अधिक प्रसन्न देख कर भगवान् शिव ने पूछा की क्या बात है ? नारद जी किस कारण आप इतना अधिक प्रसन्न हो। नारद जी बताते है की उन्हें श्री भगवान् विष्णुजी का प्रसाद जो खाने को मिला है। मैं तो धन्य हो गया, नारायण – नारायण।

भगवान् शिव ने नारद जी से कहा यह तो गलत बात है नारद जी आपने अकेले ही भगवान का पूरा प्रसाद खा लिया थोड़ा तो हमारे लिए भी ले आते। नारद जी बोलते है कि भगवान् का प्रसाद खाते हुए मुझे भगवान के सिवाए कुछ और याद् ही नहीं रहा, मैंने सारा प्रसाद खा लिया।

तभी भगवान् शिव की नज़र नारद जी के मुँह पर लगे एक चावल के दाने पर पड़ी, भगवान् शिव ने वो एक दाना ही प्रसाद का ग्रहण कर लिया। फिर तो वो भी भगवान् विष्णु में ही मगन हो गए और खुशी से नृत्य करने लगे। माता पार्वतीजी ने जब भगवान् शिव को इस तरह से भक्तिभाव में विलीन होकर नृत्य करते हुए देखा तो वो पूछने लगी की ऐसा क्या हुआ जो आप इतने अधिक प्रसन्न हो कृपया बताइये।

भगवान् शिव ने सारी कथा माँ पार्वती जी को बता दी। फिर तो माता पार्वती नाराज हो जाती है और भगवान् शिव से कहती है की मैं आपकी अर्धांगी हूँ। फिर भी आपने मुझे प्रशाद नहीं दिया और अकेले ही भगवान् का प्रसाद खा लिया। आपको एक दाना मिला था तो आधा आप कहते और आधा मुझे देते।

माता पार्वती जी नाराज होकर वैकुण्ठ धाम प्रभु विष्णु जी के पास जाकर उनसे लड़ने लगी। उन्होंने कहा की आपने मुझे अपना प्रसाद नहीं दिया और नारदजी और भगवान् शिव सबको प्रसाद मिल गया। सिर्फ मुझे ही नहीं मिला। फिर भगवान् माता लक्ष्मी से कहते है की आप फिर से भोजन बनाइये और फिर वो प्रसाद माता पार्वती जी को भी प्रदान करिये। तब जाकर माता का क्रोध शांत हुआ।

भगवान विष्णुजी ने माता पार्वती जी को वचन दिया की मैं कलयुग में दारुब्रह्म रूप में जगन्नाथपुरी में विराजमान होऊंगा। वहा पर मेरा 56 प्रकार का प्रसाद बनाया जायेगा,वह प्रसाद मुझे चढ़ाने के बाद आपको प्रसाद सबसे पहले दिया जायेगा। इसलिए आपका मंदिर भी वही पर उसी प्रांगड़ में स्थापित होगा। वहा पर आपका नाम – “माता विमला देवी” के नाम से प्रसिद्ध होगा और सभी लोग आपकी पूजा करेंगे। आपको प्रसाद चढ़ाने के बाद वह प्रसाद महाप्रसाद बन जायेगा। उसके बाद ही सबको वितरित किया जायेगा। इस महाप्रसाद को पाकर सभी लोग धन्य हो जायेंगे और उनके सभी तरह के पापो का अंत होगा।

तो आपने देखा की भगवान् का यह महाप्रसाद पाने के लिए देवताओ को भी बहुत तप करना पड़ता है। और हम सब यह महाप्रसाद भगवान जगन्नाथजी के धाम में प्राप्त कर सकते है। इस महाप्रसाद की महिमा अपरम्पार है।

आप सभी को जानकर बेहद हैरानी होगी की पुरी नगर में जब भी किसी की मृत्यु का भोजन लोगो को खिलाया जाता है तो सिर्फ भगवान् का यही प्रसाद ही सबको दिया जाता है। जो की काफी रोचक बात है।

आपको यह जानकर हैरानी होगी की पूरे विश्व में कही भी रोज 56 प्रकार के व्यंजन नहीं बनते। सिर्फ भगवान् जगन्नाथ धाम में ही रोज 56 प्रकार के व्यंजन बनाये जाते है। यह 56 प्रकार क्या – क्या होते है?

  • खाजा (सूखा प्रसाद ) उड़िया भाषा में इसे बोलते है फेनी,यह सबसे अधिक प्रसिद्ध सूखा प्रसाद है।
  • गाजा
  • जगन्नाथ वलभ
  • नमकीन कुरमाँ
  • मीठा कुरमा
  • पूरी

इसी तरह से सारे प्रसाद की बड़ी ही लम्बी लिस्ट है। खिचड़ी भी भगवान् के प्रसाद में शामिल है और वो भी कई प्रकार की।

आप जब वहां दर्शन करने जायेंगे तो आप स्वयं इस अद्भुत महाप्रसाद का आनंद ले पायेंगे।

भगवान् के इस महाप्रसाद में 56 प्रकार के ही व्यंजन क्यों शामिल किये गए है ? क्या आपने कभी सोचा है की यह 57 या 54 व्यंजन क्यों नहीं होते। इसमें भी एक रहस्य है।

आप सभी जानते है की भगवान् कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था क्यों ? क्यूंकि भगवान् इंद्र ने नाराज होकर भीषण बारिश की थी। जिसकी वजह से सारा वृन्दावन गांव डूबने लगा था। उस वक़्त भगवान् कृष्ण ने अपनी छोटी ऊँगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाया था और सभी गांव वालो को उस भीषण बारिश से बचाया था।

यह बारिश पुरे सात दिनों तक चली थी। भगवान् ने उन सात दिनों तक भोजन नहीं किया था। ठीक इसी तरह से राजा परीक्षित की भी मृत्यु ७ दिनों में ही हुई थी। इसी तरह हम सभी की भी मृत्यु सात ही दिनों में होगी, वो कैसे, वो इस तरह से की सप्ताह में सात ही दिन होते है और उन्ही सात दिनों में से ही किसी एक दिन ही हम सभी की मृत्यु निश्चित ही होगी। है न एक विचित्र बात नंबर सात की। Numerology में भी नंबर सात का विशेष महत्व है।

भगवान् को दिन में आठ बार प्रसाद लगाया जाता है। हर तीन घंटे के बाद भगवान् को प्रसाद अर्पित किया जाता है। इसीलिए जब भगवान् ने उन सात दिनों तक भोजन नहीं किया लगातार गोवर्धन पर्वत को अपनी ऊँगली पर उठा कर रखा। तब आठवे दिन भगवान् को 56 प्रकार के व्यंजनो का भोजन बना कर प्रसन्न किया गया।

56 कैसे गिना ?

7 दिन भोजन नहीं किया और भगवान् दिन में आठ बार भोजन करते है। तो 7 *8 =56

अब आपको पता चला की 56 व्यंजन ही क्यों बनाये जाते है। है ना यह रोचक सत्य

भगवान् के प्रसाद में कुछ चीजों को कभी भी इस्तेमाल नहीं किया जाता है। जो भी चीजें विदेश से आयी है, मतलब की जिनकी उत्पत्ति प्रारम्भ से ही भारत में नहीं हुई है, वो काफी बाद में विदेशो से यहाँ भारत में आई है।

जो की इस प्रकार है :

टमाटर – आलू – भिंडी – पत्तागोभी

फूलगोभी – करेला -बीन्स – प्याज – लहसुन

इन सभी चीजों को भगवान् जगन्नाथ जी के प्रसाद में शामिल नहीं किया जाता।

यह है भाग-२ भगवान् जगन्नाथ जी के मंदिर से जुड़ा। इसमें हमने भगवान् के चमत्कारी महाप्रसाद के बारे में बताया है।

भाग-३ में अगली रोचक कहानी हम भगवान् जगन्नाथजी कैसे यहाँ पुरी धाम में प्रगट हुए लेकर आएँगे।

आशा करती हूँ कि आपको हमारा यह ब्लॉग पसंद आएगा। हमने पूरी कोशिश की है की आप तक हर रहस्य को पहुंचाया जाये। आगे भी इसी तरह से हम और भी कई रोचक कहानिया और उनसे जुड़े रहस्यों के बारे में आपको बताने का पूरा प्रयास करेंगे।

जल्द ही भाग-३ के साथ मिलेंगे, तब तक के लिए नमस्कार।

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धन्यवाद और आप का दिन शुभ हो।

आपकी दोस्त,

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